कलाम-कभी सोचा न था

कलाम-कभी सोचा न था

अखबारें बेचता चला,
लोगों को ज्ञान बाँट रहा था , कभी सोचा न था|
जात के भेदभाव को छोड़ चला,
लोगों को एकजुट कर रहा था , कभी सोचा न था|
‘मिसाइल’ उड़ाने चला,
लोगों को एक मिसाल दे रहा था, कभी सोचा न था|
दौड़ता चला, गिरता चला, संभालता चला, फिर उड़ता चला|
अकेला चला जा रहा था,
करोड़ों लोग मेरे साथ चलने लगेंगे, कभी सोचा न था|
मैं बस कुछ लफ्ज़ बोल रहा था,
लोग उसे कुरआन मान बैठेंगे, कभी सोचा न था|
आँखें बंद कर आखरी सांसें गिन रहा था,
कुछ उम्मीद भरी आँखों को आंसुओं से भर चला जा रहा था, कभी सोचा न था, कभी सोचा न था|

Kalam-Kabhi socha na tha

Logon ko ekjut kar raha tha, kabhi socha na tha.
‘Missile’ udaane chala,
Logon ko ek misaal de raha tha, kabhi socha na tha.
Daudta chala, girta chala, sambhalta chala, phir udta chala.
Akela chala jaa raha tha,
Karodon log mere saath chalne lagenge, kabhi socha na tha.
Main bas kuch lafz bol raha tha,
Log use kuraan maan baithenge, kabhi socha na tha.
Aankhen band kar aakhri saansein gin raha tha,
Kuch ummeed bhari aankho ko aansuon se bhar chala jaa raha tha, kabhi socha na tha, kabhi socha na tha.

लोग बस नहीं रुके!

सुनता जा रहा था मैं , लोग केहते न रुके
जलता जा रहा था मैं , लोग आग लगते न रुके|
सिसकियाँ लेता जा रहा था मैं , लोग रुलाते न रुके
सिर चकरा जा रहा था मेरा , लोग घूमते न रुके|
बहता जा रहा था मैं , लोग कहानिया बनाते न रुके
दबता जा रहा था मैं , लोग मुझ पर चलते रा रुके|
सुनता जा रहा था मैं , लोग केहते न रुके
और बोलना चाह रहा था मैं , पर लोग बस नहीं रुके|

Sunta ja raha tha main, log kehete na ruke
Jalta ja raha tha main, log aag lagate na ruke.
Siskiyan leta ja raha tha main, log rulate na ruke
Sar chakra ja raha tha mera, log ghumate na ruke.
Behta ja raha tha main, log kahaniya banate na ruke,
Dabta ja raha tha main, log mujh par chalte ra ruke.
Sunta ja raha tha main, log kehete na ruke
Aur bolna chah raha tha main, par log bas nahi ruke.

कट्पुतली

Courtesy : Rishi Raj Singh Rathore www.instagram.com.the.indian.traveller.

Courtesy : Rishi Raj Singh Rathore
http://www.instagram.com/the.indian.traveller

ज़िन्दगी  मेरी  कट्पुतली  है  या  मैं  ज़िन्दगी  की ? आखिर  वजह  क्या  है  इस  चुबते  हुए सन्नाटे  की ? छुपाती  थी  खुदको  हर  इंसान  से , बचाती  थी  खुद  को  हर  तूफ़ान  से | पर  ज़िन्दगी  कि डोरिया  कुछ  इस  तरह  बंधी  थी , कि मैं  जिस  डोरी  से  बंधी  वह  डोरी  तो  टूटनी  ही  थी | ऐसा  झोंका  आया  हवा  का , कोई  मतलब  ना  रहा  किसी  की  दुआ  का | जिस  दाग  को  सब  से  छुपाती  चली , उस  दाग  कि  कहानी  कि  शाम  अब  तक  ना  ढली | हर  उम्मीद  पर  से  विश्वास  जो  उठ  गया , हर  रिश्ता  मुझसे  रूठ  गया | मेरी  मर्ज़ी  तक  ने  मुझे  माफ़  करने  से  इंकार  कर  दिया और  मेरे  ही  खिलाफ  जाने  का  दर्द  भरा  इकरार  कर  दिया | Zindagi meri katputli hai ya main zindagi ki? Aakhir wajah kya hai is chubte hue sannate ki? Chupati thi khudko har insaan se, bachati thi khud ko har toofaan se. Par zindagi ki doriya kuch iss tarah bandhi thi, ki main jis dori se bandhi woh dori toh tootni hi thi. Aisa jhonka aaya hawa ka, koi matlab na raha kisi ki dua ka. Jis daag ko sab se chupati chali, uss daag ki kahaani ki shaam ab tak na dhali. Har ummeed par se vishwaas jo uth gaya, har rishta mujhse rooth gaya. Meri marzi tak ne mujhe maaf karne se inkaar kar diya, aur mere hi khilaaf jaane ka dard bhara ikraar kar diya.