Agar Main Zinda Hota

ज़िंदा  रहने  की  कोशिश  या  ज़िन्दगी  जीने  की  साज़िश?
सौभाग्य  है  उनका  जिन्हें  मिली  है  यह  कश्मकश |
सोचा  तो  कभी  नहीं  अपने  ही  देश  में  कोई  अपना  नहीं
डर  में  जीते  हैं  हम, यह  सच  है  कोई  सपना  नहीं |
रोज़  खेलता  था  वह  मेरे  साथ, आज  न  जाने  क्यों  नहीं  आया
माँ  ने  कहा  कहीं  गए  हैं  वो, उनकी  बेरहम  मौत  की  खबर  को  उन्ही के कब्र  में  छुपाया |
अगर  मैं  ज़िंदा  होता  तो  पता  होता  माँ  ने  यह  सच  क्यों  छुपाया |
हम  घर  में  ही  रहते  थे  ज़्यादा तर
माँ  परेशान  रहती  थी  अक्सर |
एक  दिन  कहा  देश  छोड़कर  जाना  है
यहाँ सिर्फ  खोना, कुछ नहीं पाना है |
निकल  पड़े  थे  नयी  शुरुवात  के  लिए
सोचा  न  था  निकले  थे  ज़िन्दगी  के  विश्वासघात  के  लिए |
हमारी एक  कोशिश  थी  ज़िंदा  रहने  की
हिम्मत  तो  जूता  ली  हर  दर्द  सहने  की |
दर्द  सहने  की  ज़रुरत  ही  न  पड़ी
जब  सुई  ही  रुक  गयी  उस  घडी |
अगर  मैं  ज़िंदा  होता  तो  शायद  कहीं  खुश  होता
अगर  मैं  ज़िंदा  होता ,
ज़िंदा  रहने  या  ज़िन्दगी  जीने  के  कश्मकश  में  शायद  मैं  भी  होता , शायद  मैं  भी  होता |
This poetry is a tribute to Aylan Kurdi, his family and every Syrian refugee.

दर्द को इस नाचीज़ की बहुत याद आती है – Dard ko iss nacheez ki bahut yaad aati hai

वह हर रोज़ मेरे पास एक फरियाद लाती है
“दर्द को इस नाचीज़ की बहुत याद आती है |
प्यार करती हूँ, फिर भी कमी रह जाती है,
समझ ना चाहती हूँ, फिर भी गलत फहमी हो जाती है.
मुस्कुराना चाहती हूँ, पर आसुओं से मेरी ज़िन्दगी आबाद हो जाती है
जीना चाहती हूँ, पर दर्द को इस नाचीज़ की बहुत याद आती है |”
जब उसके लफ्ज़ बिखर गए
मेरे यह होंठ आखिर कार कुछ लफ्ज़ बोल गए
“वह दिल ही क्या जिसे दर्द का एहसास ना हो
वह मुस्कराहट ही क्या जिस में उसके लबों के अलफ़ाज़ ना हो |”

Woh har roz mere paas ek friyaad laati hai
“dard ko is naacheez ki bahut yaad aati hai.
Pyaar karti hoon phir bhi kami reh jaati hai,
Samajh na chahti hoon, phir bhi galat fehmi ho jaati hai.
Muskurana chahti hoon, par aasuon se meri zindagi aabaad ho jaati hai
Jeena chaahti hoon, par dard ko is naacheez ki bahut yaad aati hai.”
Jab uske lafz bikhar Gaye
Mere Yeh hont aakhir kaar kuch lafz bol gaye
“Woh dil hi kya jise dard ka ehsaas na ho
Woh muskurahat hi kya jisme uske labon ke alfaaz na ho”